Swami Vivekananda Thoughts In Hindi

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Swami Vivekananda’s inspiring ideas for youth ( युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद के प्रेरक विचार )

Swami Vivekananda Thoughts In Hindi जो अपने आप पर विश्वास नही करता वह नास्तिक है। प्राचीन धर्मों ने कहा है वह नास्तिक है जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता। नया धर्म कहता है नास्तिक वह है जो अपने आप में विश्वास नहीं करता। सफलता प्राप्त करने के लिए जबरदस्त सतत प्रयत्न और इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

प्रयत्नशील व्यक्ति कहता हैं मैं समुंद्र पी जाऊंगा, मेरी इच्छा से पर्वत टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे इस प्रकार की शक्ति और इच्छा रखो कड़ा परिश्रम करो, तुम अपने उद्देश्य को निश्चित पाओगे। विश्वास विश्वास अपने आप पर विश्वास, ईश्वर पर विश्वास यहीं महानता का रहस्य है। यदि तुम पुराणों के 23 करोड़ देवी देवताओं और विदेशियों के द्वारा बतलाए हुए सब देवताओं में विश्वास करते हो, पर यदि अपने में विश्वास नहीं करते तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती।

स्वयं पर विश्वास रखो, उस पर स्थित रहो और शक्तिशाली बनो। यह एक बड़ी सच्चाई है, शक्ति ही जीवन है और कमजोरी मृत्यु। शक्ति प्रमुख सुख है, अजर अमर जीवन है, कम जोड़ी कभी ना काटने वाली बोझ और यंत्रणा है। संसार को बस कुछ सव साहसी स्त्री और पुरुषों की आवश्यकता है, उस साहस का अभ्यास करो जिसमें सच्चाई जानने की हिम्मत है, जिसमें जीवन की सच्चाई बताने की हिम्मत है।

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जो मृत्यु से नहीं कपता, मृत्यु का स्वागत करता है और मनुष्य को बताता है कि वह अमर आत्मा है। समस्त विश्व में कोई उसका हनन नहीं कर सकता, तब  तुम आजाद हो जाओगे। कर्म करना बहुत अच्छा है, पर वह विचारों से आता है इसलिए अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्च आदर्शों से भर लो, उन्हें रात दिन अपने सामने रखो उन्हीं में से महान कार्यों का जन्म होगा।

असफलता के चिंता मत करो वह बिलकुल स्वाभाविक है, वे असफलताएं जीवन के सौंदर्य हैं, उनके बिना जीवन क्या होता, जीवन में अगर संघर्ष ना रहे तो जीवित रहना ही व्यर्थ है। इसी संघर्ष में है जीवन का काव्य, संघर्ष और त्रुटियों का प्रवाह मत करो, असफलताओं पर ध्यान मत दो, यह छोटी-छोटी फिसलने हैं।

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आदर्श को सामने रखकर हजार बार आगे बढ़ने की प्रयत्न करो, यदि तुम हजार बार असफल होते हो तो एक बार फिर प्रयत्न करो। संसार की क्रूरता और पापो की बात मत करो, इसी बात पर खेद करो कि तुम अभी भी क्रूरता देखने की विवश हो, इसी का तुमको दुख होना चाहिए कि तुम सब ओर केवल पाप देखने के बाध्य हो।

यदि तुम संसार की सहायता करना आवश्यक समझते हो तो उसे निंदा मत करो, उसे और अधिक कमजोर न बनो, पाप दुख आदि सब क्या है? कुछ भी नहीं, वह एक कमजोरी का ही परिणाम है, इस प्रकार के उपदेशों से संसार दिन प्रतिदिन अधिकाधिक कमजोर बनाया जा रहा है। बचपन से ही उनके मस्तिष्क में निश्चित, दृढ़ और सहायक विचारों को प्रवेश करने दो।

विश्व की समस्त शक्तियां हमारी है, हमने अपना हाथ आंखों पर रख लिया है और चिल्लाते हैं कि सब और अंधेरा है। जान लो कि हमारे चारों ओर अंधेरा नहीं है। अपना हाथ अलग करो तुम्हें प्रकाश दिखाई देने लगेगा जो पहले भी था, अंधेरा कभी नहीं था, कम जोड़ी कभी नहीं थी। हम सब मूड हैं कि हम सब चिलाते हैं कि हम कमजोर हैं, अपवित्र हैं।

कमजोरी का इलाज कमजोरी का विचार करना नहीं है वरन् शक्ति पर विचार करना है। मनुष्य को शक्ति की शिक्षा जो पहले से ही उसमें है। हम देखते हैं कि एक तथा दूसरे व्यक्ति के बीच अंतर होने का कारण उसका अपने आप में विश्वास होना और ना होना ही है। अपने आप में विश्वास करने से सब कुछ हो सकता है।

क्या तुम जानते हो तुम्हारे अंदर अभी भी कितना तेज, कितनी शक्ति है छपी हुई है। क्या कोई वैज्ञानिक भी ऐसे जान सका है, मनुष्य का जन्म हुए लाखो वर्ष हो गए पर अभी तक उसके असीम शक्ति का केवल एक अत्यंत सूत्र भाग ही अभिव्यक्त हुआ है। इसलिए तुम्हें यह नहीं कहना चाहिए की तुम शक्तिहीन हो।

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तुम क्या जाने की ऊपर दिखाई देने वाली पतन की ओट में शक्ति की कितनी संभावनाएं हैं, जो सबकी तुम में है उसके बहुत ही कम भाग को तुम जानते हो, तुम्हारे पीछे अत्यंत शक्ति और शांति का सागर है। यदि मानव जाति के आज तक के इतिहास में महान पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में सबसे बड़ी प्रवर्तक शक्ति कोई है तो वह है आत्मविश्वास, जन्म से ही यह विश्वास रहने के कारण कि वह महान होने के लिए पैदा हुए हैं वे महान बने।

उपनिषदों में यदि एक ऐसा शब्द है जो वज्र वेग से अज्ञान राशि के ऊपर प्रतीत होता है, उसे बिल्कुल उड़ा देता है तो वह है अभीही यानी निर्भयता, संसार को यदि किसी एक धर्म को शिक्षा देनी चाहिए तो वह है निर्भीकता, यह सत्य है कि ऐहिक जगत में अथवा आध्यात्मिक जगत में भय ही पतन तथा पाप का कारण है।

भय से ही दुख होता है यही मृत्यु का कारण है तथा इसी के कारण सारी बुराई तथा पाप होता है। अपने स्नायु शक्ति बढ़ाओ हम लोहे की मांसपेशियां और फौलत की स्नायु चाहते हैं। हम बहुत रो चुके अब और अधिक ना रोओ बल्कि अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और मनुष्य बनो, सबसे पहले हमारे युवाओं को मजबूत बनना चाहिए धर्मेश के बाद की वस्तु हैं, मेरे दरुण मित्रों शक्तिशाली बनो मेरी तुम्हें यही सलाह है।

अपने शरीर में शक्तिशाली रक्त प्रवाहित होने पर श्री कृष्ण के तेजस्वी गुडो और उनकी अपार शक्ति को अधिक समझ सकोगे जब तुम्हारे शरीर मजबूती से तुम्हारे पैरों पर खड़ा रहेगा और तुम अपने को मनुष्य अनुभव करोगे तब तुम उपनिषद और महानता को अधिक अच्छे से समझ सकोगे।

इच्छाशक्ति ही सबसे अधिक बल बुद्धि है इसके सामने हर एक वस्तु झुक जाती है क्योंकि वह ईश्वर और स्वयं ईश्वर से ही आती है, पवित्र और दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है। क्या तुम इस मे विश्वास करते हो? मनुष्य केवल मनुष्य ही हमें चाहिए, फिर हर एक वस्तु हमें प्राप्त हो जाएगी, हमें चाहिए केवल दृढ़ तेजस्वी आत्म विश्वासी तरुण, ठीक-ठीक सच्चे हृदय वाले युवक, यदि ऐसे 100 व्यक्ति भी मिल जाए तो संसार आंदोलित हो उठेगा उसमें विशाल परिवर्तन हो जाएगा।

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समस्त संसार हमारी मातृभूमि का महान रीडी है किसी भी देश को ले लीजिए इस जगत में एक भी ऐसी जाति नहीं है जिसका संसार उतना रीडी हो जितना कि वह यहां के धैर्य सील और विनम्र हिंदुओं का है। अनेकों के लिए भारतीय विचार, भारतीय रीति रिवाज, भारतीय दर्शन, भारतीय साहित्य पहली नजर में ही घरीनस्मत प्रतीत होता है, पर यदि वे सतत प्रयत्न करें पढ़ें तथा इन विचारों में निहित महान तथ्य से परिचित हो जाए तो परिणाम स्वरूप उनमें से 99% आनंद से बिभोर होकर उन पर मुक्त हो जाएंगे।

अन्य देशों में धर्म की केवल चर्चा ही होती है, पर ऐसे धार्मिक पुरुष जिन्होंने धर्म को अपने जीवन में परिणित किया है जो स्वयं साधक हैं केवल भारत में ही है। अभी भी हमारे पास कुछ ऐसे बातें हैं जिनकी शिक्षा हम संसार को दे सकते हैं। यही कारण है कि सैकड़ों वर्ष तक अत्याचारों को सहने लगभग हजारों वर्षों तक विदेशी शासन में रहने और विदेशियों द्वारा पीड़ित होने पर भी यह देश आज तक जीवित रहा है।

उसके अभी भी अस्तित्व में जीवित रहने का कारण यही है की वे सदैव और अभी भी ईश्वर का आश्रय लिए हुए हैं तथा धर्म एवं आध्यात्मिकता के अमूल्य भंडार का अनुसरण करता आया है। हमारा अहंकारी रईस्य पूर्वज हमारे देश के सर्वसाधारण जनता को अपने पैरों से तब तक कुचलते रहे जब तक कि वे निशा हाय नहीं हो गए, जब तक कि वे बेचारे गरीब प्राया यह तक भूल नहीं गए कि वे मनुष्य है।

वे शताब्दियों तक केवल लकड़ी काटने और पानी भरने को इस तरह बिवस किए गए की उन्हें विश्वास हो गया कि वे  गुलाम के  रूप में जन्मे है। हमारे देश में अभी भी धर्म  और आध्यात्मिकता विद्यमान है जो मानो ऐसे स्रोत है जिन्हें आबाद गति से बढ़ते हुए समस्त विश्व को अपनी बाढ़ से अप्लाबित कर पश्चात्य तथा अन्य देशों को नवजीवन तथा नव शक्ति प्रदान करनी होगी।

ध्यान रहे यदि तुम इस आध्यात्मिकता का त्याग कर दोगे और इससे एक कोर रखकर पश्चिम की जड़वा पूर्व सभ्यता के पीछे दौड़ो गे तो नतीजा यह होगा की तीन पीढ़ीयो में तुम एक मृत्यु जाति बन जाओगे क्योंकि इससे राष्ट्रीय की रीढ़ टूट जाएगी राष्ट्रीय की वह निव जिस पर इसका निर्माण हुआ है नीचे धंस जाएगी और इसका फल सर्वांगीण विनास होगा उपनिषदों का सत्य तुम्हारे समक्ष है। उन्हें स्वीकार करो उनके अनुसार अपना जीवन बनाओ और इसी से शीघ्र ही भारत का उद्धार होगा।

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